नबी-ए-करीम हज़रत मुहम्मद ﷺ से मोहब्बत हर मुसलमान के ईमान का अहम हिस्सा है। लेकिन एक सवाल अक्सर सामने आता है:
"जो शख़्स ईद मिलादुन्नबी ﷺ नहीं मनाता, Kya Milad Na Manane Wala Nabi ﷺ se Mohabbat Nahi Karta?"
इसका जवाब है: नहीं, केवल मिलाद न मनाने की वजह से किसी मुसलमान के दिल की मोहब्बत का फैसला नहीं किया जा सकता।
किसी के दिल में मोहब्बत है या नहीं, इसका पूरा हाल अल्लाह ही जानता है। हमें लोगों के दिलों का फैसला करने के बजाय कुरआन और सुन्नत की रोशनी में यह देखना चाहिए कि नबी ﷺ से सच्ची मोहब्बत की पहचान क्या है।
✍️ By: Mohib Tahiri | 🕋 Islamic Articles| Eid Milad ki sunnat|Nabi ﷺ se Asal Mohabbat|Mohabbat e Rasool ﷺ ki pahchanb🕰 Updated:23 Aug 2026
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| Asal mohabbat Eid Milad ke jashn me nahi balki Nabi ﷺ ki pairwi me hai |
इस आर्टिकल Kya Milad Na Manane Wala Nabi ﷺ se Mohabbat Nahi Karta? में हम जज़्बात से नहीं बल्कि सही दीन की हैसियत से समझेंगे कि नबी ﷺ से सच्ची मुहब्बत का मयार क्या है? और जो मिलाद मानने से रोकते हैं उसकी ख़ास वजह क्या है?
नबी ﷺ से मोहब्बत ईमान का हिस्सा है
अल्लाह के रसूल ﷺ ने फरमाया:
"तुम में से कोई व्यक्ति उस समय तक मोमिन नहीं हो सकता, जब तक मैं उसके लिए उसके पिता, उसकी औलाद और तमाम लोगों से ज्यादा महबूब न हो जाऊं।"
इससे पता चलता है कि रसूलुल्लाह ﷺ से मोहब्बत बहुत बड़ी चीज़ है। लेकिन सवाल यह है कि इस मोहब्बत का सबूत क्या है?क्या सिर्फ किसी खास दिन जश्न मनाना मोहब्बत की निशानी है? या फिर पूरी जिंदगी नबी ﷺ की बताई हुई राह पर चलना भी मोहब्बत का हिस्सा है?
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कुरआन ने मोहब्बत की पहचान क्या बताई?
अल्लाह तआला फरमाता है:
कह दीजिए: अगर तुम अल्लाह से मोहब्बत करते हो तो मेरी पैरवी करो, अल्लाह तुमसे मोहब्बत करेगा।"
(सूरह आले इमरान: 31)
इस आयत में मोहब्बत का बहुत साफ रास्ता बताया गया है। अल्लाह से मोहब्बत का दावा हो तो रसूल ﷺ की पैरवी की जाए।
इसलिए सच्ची मोहब्बत केवल जुबान से "या रसूलल्लाह ﷺ हम आपसे मोहब्बत करते हैं" कहने का नाम नहीं, बल्कि आपकी सुन्नत को अपनी जिंदगी में अपनाने का नाम भी है।
मिलाद न मनाने वाला क्या नबी ﷺ का दुश्मन है?
हरगिज़ नहीं।
जो मुसलमान मिलाद नहीं मनाता, उसके बारे में यह फैसला कर देना कि:
- उसे नबी ﷺ से मोहब्बत नहीं,
- वह नबी ﷺ का दुश्मन है,
- वह दीन का दुश्मन है,
ऐसा कहना मुनासिब नहीं।
हो सकता है वह इस मामले में बिल्कुल हस्सास हो, दीन को वो उसी तरीक़े से अपनाता हो जो तरीक़ा नबी ﷺ अपनी उम्मत के लिए छोड़ कर गए।
हो सकता है वह यह समझता हो कि नबी ﷺ, सहाबा किराम और शुरुआती मुसलमानों से इस तरह का सालाना जश्न साबित नहीं है।
इसलिए वह एहतियात के तौर पर इसे नहीं मनाता। उसके दिल का हाल अल्लाह बेहतर जानता है।
जो मिलाद मनाने से मना करते हैं, उनकी नीयत क्या हो सकती है?
यह बात भी समझने की जरूरत है कि जो लोग मिलाद मनाने से मना करते हैं, ऐसा जरूरी नहीं कि वे नबी ﷺ से मोहब्बत नहीं करते।
बहुत से लोग ऐसा इसलिए कहते हैं क्योंकि वे समझते हैं कि दीन में वही काम किया जाना चाहिए जो कुरआन, सहीह सुन्नत और नबी ﷺ के तरीके से साबित हो।
उनकी नीयत यह हो सकती है कि लोग ऐसी चीज़ को दीन का जरूरी हिस्सा न बना लें जो उनके नजरिए में नबी ﷺ, सहाबा किराम और सलफ से साबित नहीं है।
इसलिए यदि कोई व्यक्ति कहता है:
"भाई! इस तरीके को दीन का जरूरी हिस्सा मत बनाइए। नबी ﷺ की सुन्नत और साबित अमल को अपनाइए।"
तो केवल इस वजह से यह कहना सही नहीं कि वह नबी ﷺ से मुहब्बत नहीं करता है।
बल्कि हो सकता है वह अपनी समझ के अनुसार लोगों को आखिरत के नुकसान से बचाने की कोशिश कर रहा हो।
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मिलाद मनाने वाले और न मनाने वाले की नबी ﷺ से मोहब्बत
इस पूरे मसले को समझने के लिए एक बहुत अहम बात समझना जरूरी है।
जो लोग ईद मिलादुन्नबी ﷺ मनाते हैं, उनमें बहुत से लोग नबी ﷺ की मोहब्बत में ही इसे मनाते हैं।
वे नबी ﷺ की पैदाइश का जिक्र करते हैं, सीरत बयान करते हैं, दरूद पढ़ते हैं और अपने दिल की मोहब्बत का इजहार करते हैं।
लेकिन दूसरी तरफ जो लोग ईद मिलाद के आयोजन से रोकते हैं, वे भी नबी ﷺ की मोहब्बत में ही रोकते हैं।
उनका कहना होता है कि नबी ﷺ से मोहब्बत अपनी जगह बिल्कुल सही है, लेकिन किसी काम को दीन का हिस्सा बनाने के लिए यह देखना जरूरी है कि वह काम कुरआन, सहीह सुन्नत और नबी ﷺ तथा सहाबा किराम के अमल से साबित है या नहीं।
उनके नजरिए में ईद मिलाद कोई फर्ज़ या सुन्नत नहीं है, बल्कि बाद के दौर में पैदा होने वाला एक धार्मिक आयोजन है। इसलिए वे लोगों को इससे बचने की सलाह देते हैं।
इसलिए हर मिलाद मनाने वाले को नबी ﷺ का दुश्मन कहना गलत है और हर मिलाद से रोकने वाले को नबी ﷺ से बे-मोहब्बत कहना भी गलत है।
लेकिन यहां एक दूसरी गंभीर चिंता भी है
कुछ लोग एक कहावत कहते हैं:
"बिदअत कभी बांझ नहीं होती।"
इसका मतलब यह समझाया जाता है कि जब किसी ऐसी चीज को दीन का हिस्सा बना दिया जाए जो दीन में साबित नहीं, तो समय के साथ उसके अंदर और चीजें जुड़ती चली जा सकती हैं।
आज हमें इस चिंता को गंभीरता से देखने की जरूरत है।
अगर किसी दीनी रस्म के नाम पर हर साल ऐसे काम बढ़ते जाएं जिनका शरीअत से कोई ताल्लुक नहीं, तो हमें रुककर सोचना चाहिए कि आखिर हम किस रास्ते पर जा रहे हैं।
मिलाद के नाम पर गलत कामों से बचना जरूरी है
अगर किसी जगह मिलाद के नाम पर:
- शिर्किया और बेशर्मी वाले गाने बजाए जाएं,
- डीजे और नाच-गाने का इंतजाम किया जाए,
- औरतों और मर्दों का बे-पर्दा और अनुचित मेल-जोल हो,
- फिजूलखर्ची की जाए,
- झूठे या मनघड़त किस्सों को दीन समझकर फैलाया जाए,
- नबी ﷺ के बारे में ऐसी बातें कही जाएं जो शरीअत और सहीह अक़ीदे के खिलाफ हों,
- या नबी ﷺ की मोहब्बत के नाम पर कोई ऐसा काम किया जाए जो खुद शरीअत में गलत है,
तो ऐसे कामों को नबी ﷺ की मोहब्बत का नाम नहीं दिया जा सकता। नबी ﷺ से मोहब्बत का मतलब यह नहीं कि उनके नाम पर कोई भी काम कर लिया जाए।
बल्कि मोहब्बत का तकाज़ा यह है कि उनकी इज्जत, उनकी सुन्नत और उनकी बताई हुई शरीअत की हदों का ख्याल रखा जाए।
"नबी ﷺ ने क्युँ कहा हर बिदअत गुमराही है?
इसलिए यदि कोई व्यक्ति कहता है:
"भाई! ऐसी नई रस्में आगे चलकर दीन का हिस्सा समझी जाने लगेंगी, इसलिए इन्हें मत करो,इसे रोक लो"
तो उसकी इस बात को तुरंत नबी ﷺ की दुश्मनी या नफरत का नाम दे दिया जाता है।
♦️ हो सकता है उसकी चिंता यही हो कि आज एक रस्म शुरू होगी और कल उसमें दस नई रस्में शामिल हो जाएंगी।
मोहब्बत में भी शरीअत की पाबंदी जरूरी है
हमें यह बात हमेशा याद रखनी चाहिए:
नबी ﷺ से मोहब्बत बहुत जरूरी है, लेकिन नबी ﷺ की मोहब्बत के नाम पर शरीअत की हदों को पार करना मोहब्बत का सही तरीका नहीं।
अल्लाह तआला फरमाता है:
कह दीजिए: अगर तुम अल्लाह से मोहब्बत करते हो तो मेरी पैरवी करो, अल्लाह तुमसे मोहब्बत करेगा।"(सूरह आले इमरान: 31)
इस आयत में मोहब्बत के साथ पैरवी को जोड़ा गया है। इसलिए असली सवाल यह नहीं होना चाहिए कि कौन नबी ﷺ से ज्यादा मोहब्बत करता है। बल्कि सवाल यह होना चाहिए:
हमारी मोहब्बत नबी ﷺ की सुन्नत और शरीअत के मुताबिक कितनी है?
दोनों तरफ के लोगों को एक बात समझनी चाहिए
जो मिलाद मनाते हैं, वे अगर सचमुच नबी ﷺ की मोहब्बत में मनाते हैं तो उन्हें चाहिए कि मिलाद के नाम पर होने वाली हर गलत और गैर-शरई चीज का विरोध करें। उनका विरोध नहीं जो रोकते हैं। आज के मोऑशरे में होने वाले वाक़ियात, ख़ुराफ़ात और bidat को देखें और रोकें।
और जो मिलाद से रोकते हैं, उन्हें भी चाहिए कि नर्मी, हिकमत और अच्छे अखलाक के साथ समझाएं, की आप जो कर रहे हैं ये वो दिन नहीं जो नबी ﷺ ले कर आए थे हमारे लिए।
दीन वही सही है जो क़ुरआन और सुन्नत से है और जिसमें आख़िरत की कामयाबी है। हम वो अमल क्यों करे जिससे कहीं आख़िरत में हमारी पकड़ हो जाए।
असली काम क्या है?
अगर हम सचमुच नबी ﷺ से मोहब्बत करते हैं तो साल में केवल एक दिन तक अपनी मोहब्बत को सीमित न रखें।
पूरी जिंदगी:
नमाज कायम करें, सुन्नत अपनाएं, झूठ छोड़ें, गाली-गलौज छोड़ें, हराम से बचें, माता-पिता के हक अदा करें, पड़ोसियों के साथ अच्छा व्यवहार करें, गरीबों की मदद करें, दरूद पढ़ें और नबी ﷺ की सीरत को अपनी जिंदगी में उतारें।
यही मोहब्बत को अमल में बदलने का रास्ता है।
बेशक ! मिलाद मनाने वाला नबी ﷺ की मोहब्बत में मनाता है , और जो रोकता है वह भी नबी ﷺ की मुहब्बत में ही सुन्नत और लोगों की आखिरत बचाने की चिंता में रोकता है। नबी ﷺ से बुग्ज़ की वजह से नहीं। इस लिए रोकने वाले पर तनक़ीद की बजाए उसके मकसद को समझने की कोशिश करें।
जिस काम में साफ तौर पर शरीअत की खिलाफवर्जी हो, चाहे वह किसी भी धार्मिक नाम से किया जाए, उससे बचना जरूरी है।
मुसलमानों का मकसद एक-दूसरे की नीयत पर हमला करना नहीं, बल्कि कुरआन और सुन्नत की रोशनी में सही रास्ते की तलाश करना और एक दूसरे की रहनुमाई के लिए होना चाहिए।
सच्ची मोहब्बत-ए-रसूल ﷺ की कुछ निशानियां
नबी ﷺ से मोहब्बत केवल एक मौके या एक दिन तक सीमित नहीं होनी चाहिए। सच्ची मोहब्बत की कुछ निशानियां यह हैं:
1. नबी ﷺ की इताअत करना
अल्लाह तआला फरमाता है:
"जिसने रसूल की इताअत की, उसने वास्तव में अल्लाह की इताअत की।"
(सूरह अन-निसा: 80)
इसलिए नबी ﷺ की बात को अपनी जिंदगी में मानना मोहब्बत का बड़ा सबूत है।
2. नबी ﷺ की सुन्नत को अपनाना
खाने, पीने, नमाज, अखलाक, लोगों के साथ व्यवहार, परिवार के साथ व्यवहार और जिंदगी के दूसरे मामलों में नबी ﷺ के तरीके को अपनाना मोहब्बत है।
3. नबी ﷺ पर ज्यादा से ज्यादा दरूद पढ़ना
दरूद शरीफ पढ़ना मुसलमान के लिए बहुत बड़ी नेमत है।
अल्लाह तआला फरमाता है:
"बेशक अल्लाह और उसके फरिश्ते नबी पर दरूद भेजते हैं। ऐ ईमान वालो! तुम भी उन पर दरूद और सलाम भेजो।"
(सूरह अल-अहज़ाब: 56)
4. नबी ﷺ के अखलाक को अपनाना
नबी ﷺ ने इंसानियत के साथ रहना, सच्चाई, अमानत, रहम, माफी, पड़ोसी के हक और गरीबों की मदद करना सिखाया।
अगर कोई व्यक्ति नबी ﷺ से मोहब्बत का दावा करता है तो उसके व्यवहार में भी नबी ﷺ की शिक्षा दिखाई देनी चाहिए।
5. नबी ﷺ की बताई हुई बात को अपनी राय पर प्राथमिकता देना
सच्चा मुसलमान अपनी पसंद और नापसंद से ऊपर अल्लाह और उसके रसूल ﷺ के हुक्म को रखता है।
अल्लाह तआला फरमाता है:
ईमान वालों के लिए यह उचित नहीं कि जब अल्लाह और उसका रसूल किसी मामले का फैसला कर दें तो उनके लिए अपने मामले में कोई और विकल्प बाकी रहे।"
(सूरह अल-अहज़ाब: 36)
मोहब्बत का असली सवाल क्या होना चाहिए?
हमें यह सवाल कम करना चाहिए:
"तुम मिलाद मनाते हो या नहीं?"
बल्कि यह सवाल ज्यादा करना चाहिए:
"क्या हम नबी ﷺ की सुन्नत पर चलते हैं?"
- क्या हमारी नमाज नबी ﷺ के तरीके के अनुसार है?
- क्या हमारा कारोबार ईमानदारी वाला है?
- क्या हम झूठ से बचते हैं?
- क्या हम माता-पिता के साथ अच्छा व्यवहार करते हैं?
- क्या हम पड़ोसियों के अधिकार अदा करते हैं?
- क्या हम गरीबों और जरूरतमंदों की मदद करते हैं?
- क्या हम नबी ﷺ की बताई हुई शिक्षाओं को अपनी जिंदगी में लाने की कोशिश करते हैं?
यही वे सवाल हैं जो हमारी मोहब्बत को व्यवहार में बदलते हैं।
एक जरूरी बात: नीयतों का फैसला अल्लाह पर छोड़ दें
मिलाद के मुद्दे पर मुसलमानों में अलग-अलग राय पाई जाती है। इस मतभेद को आपसी दुश्मनी का कारण न बनाएं।
जो नहीं मनाता, उसके बारे में यह न कहें कि:
"तुम्हें नबी ﷺ से मोहब्बत नहीं।"
बल्कि उसके न मनाने के कारण को समझने की कोशिश करें और उससे पूछे कि क्यों नहीं मानते हो?
और जो मनाता है, उसके बारे में भी बिना जांच के यह न कहें कि:
"तुम दीन के दुश्मन हो,दीन में बिगाड़ पैदा कर रहे हो,नबी ﷺ के नाम पर दीन में अपनी तरफ से चीजें जोड़ रहे हो।"
बल्कि दलील से बात करें, उन्हें समझाएं कि दीन को गहराई से समझने की कोशिश करे। क्योंकि नियत का फ़ैसला अल्लाह करता है,किसके दिल में क्या है अल्लाह ही बेहतर जनता है।
जो मना करते हैं, उनकी बात और मक़सद को भी समझिए
अगर कोई मुसलमान मिलाद के मनाने से मना करता है तो पहले उसकी बात समझने की कोशिश करें।
हो सकता है वह यह मानता हो कि:
"नबी ﷺ से मोहब्बत का सही तरीका आपकी सुन्नत पर चलना है और दीन में किसी नए धार्मिक आयोजन को शामिल करने से बचना चाहिए।"
उसकी इस सोच का जवाब भी गाली, ताना और इल्जाम से नहीं, बल्कि कुरआन और सुन्नत की दलील से होना चाहिए।
और अगर कोई व्यक्ति यह कह रहा है कि वह लोगों को आखिरत के नुकसान से बचाना चाहता है, तो उसकी नीयत को तुरंत नफरत या दुश्मनी का नाम देना इंसाफ नहीं।
क्योंकि हम बेहतरीन उम्मत हैं जो एक दूसरे की भलाई के लिए पैदा किए गए हैं।
हमें एक-दूसरे से नफरत नहीं, दीन की सही समझ चाहिए
मुसलमानों को याद रखना चाहिए कि दीन का मकसद आपसी लड़ाई पैदा करना नहीं है।
हमारा असली काम है:
तौहीद को मजबूत करना, नमाज कायम करना, सुन्नत को अपनाना, गुनाहों से बचना, अच्छे अखलाक पैदा करना और आखिरत की तैयारी करना।एक दूसरे को बुराई से रोकना और भलाई की तरफ़ बुलाना।
मिलाद के मुद्दे पर किसी से मतभेद हो जाए तो भी मुसलमान की जुबान से गाली, झूठ, बदगुमानी और तकफीर नहीं निकलनी चाहिए।
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Conclusion:
मिलाद न मनाने वाला जरूरी नहीं कि नबी ﷺ से मोहब्बत नहीं करता।
किसी व्यक्ति के दिल की मोहब्बत का फैसला केवल किसी एक अमल को देखकर नहीं किया जा सकता।
इसी तरह जो लोग मिलाद मनाने से मना करते हैं, उनके बारे में भी यह कहना सही नहीं कि वे नबी ﷺ के दुश्मन हैं। बहुत से लोग अपनी समझ के अनुसार सुन्नत की पैरवी और दीन में नई चीजों से बचने की कोशिश में ऐसा कहते हैं। उनकी नीयत यह भी हो सकती है कि लोग आखिरत के नुकसान से बचें।
इसलिए हमें लोगों की नीयतों का फैसला करने के बजाय कुरआन और सही सुन्नत को समझना और उस पर अमल करना चाहिए।
नबी ﷺ से सच्ची मोहब्बत का सबसे खूबसूरत रास्ता यह है कि हम आपकी इज्जत करें, आप पर दरूद भेजें, आपकी सीरत पढ़ें, आपकी सुन्नत सीखें और अपनी पूरी जिंदगी को आपकी बताई हुई हिदायत के मुताबिक ढालने की कोशिश करें।
🤲 अल्लाह तआला हमें सच्ची मोहब्बत-ए-रसूल ﷺ, सही समझ और सुन्नत पर चलने की तौफीक अता फरमाए। आमीन।
FAQs:
1. Kya Milad na manane wala Nabi ﷺ se mohabbat nahi karta?
Nahi. Sirf Milad na manane ki wajah se kisi ke dil ki mohabbat ka faisla nahi kiya ja sakta. Bahut se log Nabi ﷺ se mohabbat ki wajah se hi Milad nahi manate, kyunki unka nazariya hai ke deen mein wahi amal kiya jaye jo Quran aur Sunnat se sabit ho.
2. Kya Milad manane wale Nabi ﷺ se mohabbat karte hain?
Bahut se log Milad Nabi ﷺ ki mohabbat mein hi manate hain. Isliye har Milad manane wale ki niyyat ko bura samajhna ya use Nabi ﷺ se be-mohabbat kehna durust nahi.
3. Jo Milad se rokte hain kya wo Nabi ﷺ ke dushman hain?
Nahi. Bahut se log Nabi ﷺ ki mohabbat aur Sunnat ki pairvi ki fikr mein Milad se rokte hain. Unka maqsad logon ko unke nazariye ke mutabiq aakhirat ke nuqsan se bachana hota hai.
4. Kya Milad Nabi ﷺ ki Sunnat ya Farz hai?
Milad ko Farz ya Sunnat-e-Muakkadah kehne ke liye Quran aur Sahih Sunnat se wazeh daleel zaroori hai. Jo log ise nahi mante, unka bunyadi aitraz yahi hota hai ke Nabi ﷺ aur Sahaba Kiram se is tarah ka saalana dini jashn sabit nahi.is liye ye Sunnat ya farz nahi balki baad ki ijaad hai.
5. Kya Milad ke naam par hone wale ghalat kaam durust hain?
Nahi. Agar kisi jagah Milad ke naam par fahash gane, DJ, naach, be-pardagi, israaf ya doosre najaiz kaam kiye jayen to un ghalat kaamon ko Nabi ﷺ ki mohabbat ka naam nahi diya ja sakta.
6. "Bidat kabhi baanjh nahi hoti" ka kya matlab hai?
Ye ek mashhoor kahawat hai, hadees nahi. Iska matlab ye samjha jata hai ke jab deen ke naam par koi nayi rasam shuru hoti hai to waqt ke saath us mein mazeed rasmein aur naye kaam shamil ho sakte hain.Jo aaj dekhne ko mil raha hai.naye naye Khurafat, Bidat,Mard aur auraton ka juloos me ek Saath.
7. Kya Milad ke naam par koi khaas namaz padhna jaiz hai?
Agar kisi khaas din ke liye "Eid Milad ki namaz" ko ek muqarrar dini namaz samjha jaye, to uske liye Shariat se daleel zaroori hai. Ibadat ka tareeqa apni taraf se muqarrar nahi kiya ja sakta.ye Bidat ke siwa kuchh nahi.
8. Nabi ﷺ se sachchi mohabbat ki nishani kya hai?
Nabi ﷺ se sachchi mohabbat ki aham nishani aap ﷺ ki itaat, Sunnat ki pairvi, aap ﷺ par durood bhejna aur aap ﷺ ki taleemat ko apni zindagi mein lagu karna hai.
9. Kya Milad ke masle par Musalmanon ko ek doosre se nafrat karni chahiye?
Nahi. Ikhtilaf ke bawajood adab, daleel aur husn-e-akhlaq ka daman nahi chhorna chahiye. Kisi ki niyyat ka faisla Allah Ta'ala par chhor dena chahiye.
10. Quran mein Allah se mohabbat ki kya nishani batayi gayi hai?
Surah Aal-e-Imran Ayat 31 mein Allah Ta'ala ne farmaya ke agar tum Allah se mohabbat karte ho to Nabi ﷺ ki pairvi karo. Isse maloom hota hai ke mohabbat ka saboot itaat aur pairvi hai.

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