दुनियाँ के कई मुल्कों में रहने बसने वाली मुस्लिम आबादी का एक बड़ा हिस्सा इस्लामी कैलेंडर के माहे रवीउलअव्वल की 12 तारीख को Jashn-e-Eid Milad-un-Nabi ﷺ मनाता है। रसूलुल्लाह ﷺ से मोहब्बत हर मुसलमान के ईमान का अहम हिस्सा है। एक मोमिन के लिए नबी ﷺ की सीरत, आपकी सुन्नत और आपकी शिक्षाएँ उसकी ज़िंदगी का मार्गदर्शन हैं।
आज Jashn-e-Eid Milad-un-Nabi ﷺ के बारे में मुस्लिम समाज में अलग-अलग राय पाई जाती है। कुछ लोग इसे नबी ﷺ की पैदाइश की खुशी और मोहब्बत के इज़हार का ज़रिया मानते हैं, जबकि कुछ आलिम ए दीन इसे दीन में बाद में शामिल होने वाला ऐसा दीनी रिवाज मानते हैं जो नबी ﷺ, सहाबा और ख़ुलफ़ाए राशिदीन से साबित ही नहीं।
इस लेख Jashn-e-Eid Milad-un-Nabi ﷺ Ki Haqeeqat का उद्देश्य किसी मुसलमान की नीयत पर सवाल उठाना नहीं, बल्कि क़ुरआन, सहीह अहादीस और इस्लामी इतिहास की रोशनी में इस विषय को समझना है
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| Nabi ﷺ se Asal Mohabbat unki Pairwi me hai |
इस आर्टिकल Jashn e Eid Milad un Nabi ﷺ Ki Haqeeqat में हम क़ुरआन और सही अहादीस की रोशनी में जानेंगे:
- 1. ईद मिलाद की शुरूआत कब और कैसे हुई?
- 2. ईद-मिलाद मनाना सुन्नत है या बिदअत?
- 3. नबी ﷺ की असली मोहब्बत और पैरवी का सही तरीका
- 4. कुरआन और हदीस की रोशनी में सही अमल
- 5. ईद मिलाद के नाम पर गुस्ताख़ी और बेहयाई
- 6. आम गलतफहमियों और उनकी सच्चाई
ईद मिलाद से क्या मुराद है?
ईद मिलाद से आम तौर पर वह आयोजन मुराद लिया जाता है जो रबीउल अव्वल में नबी ﷺ की पैदाइश की याद में किया जाता है। इसमें नात, तक़रीर, सीरत का बयान, खाना खिलाना और दूसरे कार्यक्रम किए जाते और जुलूस निकाले जाते हैं।
👉 यहाँ एक महत्वपूर्ण बात समझना ज़रूरी है:
असल सवाल यह है कि क्या हर साल किसी ख़ास दिन को मज़हबी त्योहार या ख़ास इबादत के रूप में मनाने की कोई शरई दलील मौजूद है? और अफ़सोस! आज आम लोग अल्लाह के कलाम और नबी ﷺ के फरमान को छोड़कर दुनियावी कामों और खुराफ़ात में लगे हुए हैं। सुन्नत को छोड़ कर बिदअत को अपनाए हुवे हैं।
👉 Aakhirat ki Zindagi hamesha ki Zindagi hai.kya aap ne wahan ki Taiyari kar li hai? Kya hai Aakhirat ka Saman jo wahan kaam ayega padhen Yahanईद मिलादुन्नबी ﷺ की शुरुआत कब हुई?
ईद मिलादुन्नबी ﷺ मनाने का कोई सही सुबूत क़ुरआन की किसी आयत, नबी ﷺ से या सहाबा किराम से मनाया जाना या किसी सहीह हदीस में नहीं मिलता। और ना ही ख़ुलफ़ाए राशिदीन और शुरुआती सदियों के प्रसिद्ध इमामों से भी इस तरह के सालाना मिलाद के जुलूस के एहतमाम का कोई भी सबूत मिलता है।फिर सवाल यह है कि इसे एक दिन के रूप में कब और कैसे मनाया जाने लगा?
ईद मिलाद की शुरुआत
(अल-बिदायह वल निहाया, जिल्द १३,सफ़ा 160, इबने कसीर)
इस बादशाह के बारे में मोवर्रिख (इतिहासकार) ने लिखा है के इसे दीन की समझ नहीं थी और ये फ़िज़ूल ख़र्च इंसान था।(अनवारे सातिया, सफ़ा 267)
उसके पहले तक क़ुरआन हदीस से साबित सिर्फ़ दो ईद ही थी मगर कुछ गुमराह लोगों की वजह से ये तीसरी ईद का आग़ाज़ हुआ जिसकी कोई दलील मौजूद नहीं है।
दीन में नई चीज़ के बारे में नबी ﷺ की हिदायत
रसूलुल्लाह ﷺ ने दीन में नई चीज़ें शामिल करने से सावधान करते हुए फ़रमाया:
इसलिए किसी भी दीनी रस्म या इबादत को अपनाने से पहले यह देखना ज़रूरी है कि वह क़ुरआन, सहीह सुन्नत और सहाबा के अमल से साबित है या नहीं।
क्या ईद मिलाद मनाना सुन्नत है?
यहाँ सबसे पहले "सुन्नत" का अर्थ समझना ज़रूरी है।
ईद मिलाद को एक ख़ास मज़हबी त्योहार के रूप में मनाने का कोई भी सबूत नबी ﷺ की सहीह हदीस में नहीं मिलता।
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
(सहीह अल-बुख़ारी: 2697, सहीह मुस्लिम: 1718)
एक दूसरी हदीस में आप ﷺ ने फ़रमाया:
इन अहादीस की रोशनी में सलफ सालिहीन का एक बड़ा तबका यह मानता है कि किसी नए मज़हबी रस्म को दीन की ख़ास इबादत या ईद का दर्जा देना मुनासिब नहीं है, क्योंकि इसकी कोई भी अमल नबी ﷺ और सहाबा से साबित नहीं।
नबी ﷺ ने अपनी पैदाइश के दिन क्या किया?
यह सवाल अक्सर किया जाता है कि अगर नबी ﷺ की पैदाइश की खुशी मनाना सही नहीं, तो आप ﷺ ने सोमवार का रोज़ा क्यों रखा? रसूलुल्लाह ﷺ ने अपनी पैदाइश के दिन कोई जलूस या मेला नहीं मनाया, बल्कि हर सोमवार का रोज़ा रखा।
सहीह मुस्लिम की हदीस
हज़रत अबू क़तादा अंसारी (रज़ि.) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ से सोमवार के रोज़े के बारे में पूछा गया, तो आपने फ़रमाया:
“इसी दिन मेरी पैदाइश हुई और इसी दिन मुझ पर (कुरआन) नाज़िल किया गया।”📖 सहीह मुस्लिम (हदीस: 2750)
असल सुन्नत
“यहाँ साफ़ नज़र आता है कि नबी ﷺ ने अपनी पैदाइश के साथ-साथ कुरआन के नुज़ूल (उतारने) का भी “जश्न” मनाया — लेकिन किस तरह?
👉 रोज़ा रखकर!
🛑 ग़ौर व फ़िक्र का लम्हा
अगर हमें नबी ﷺ से मोहब्बत है तो हमें भी उसी तरह करना चाहिए जैसा आपने किया।
लेकिन अफ़सोस, आज लोग कहते तो हैं कि “हम मोहब्बत में जश्न मना रहे हैं”, मगर उनका तरीका बिल्कुल उल्टा है। वो रोज़ा और फ़र्ज़ नमाज़ छोड़ कर जुलूस और नारे बाज़ी में मसरूफ़ रहते हैं।
क्या नबी ﷺ से मोहब्बत करना ज़रूरी है?
जी हाँ। नबी ﷺ से मोहब्बत ईमान का अहम हिस्सा है।
अल्लाह तआला फ़रमाते हैं:
और रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
(सहीह अल-बुख़ारी: 15, सहीह मुस्लिम: 44)
इसलिए नबी ﷺ से मोहब्बत करना ईमान का हिस्सा है और मोहब्बत का मतलब ये भी नहीं कि हम उनकी तालीमात को भुला दें और बीदअत को दीन का हिस्सा बनाएं। और ये मोहब्बत केवल किसी एक दिन के जश्न तक सीमित नहीं होनी चाहिए बल्कि हर पल,हर दिन उनकी तालीमात पर अमल ही असल मुहब्बत है।
यह कैसी मोहब्बत है नबी ﷺ से?
हर आने वाला साल पिछले साल को शर्मिंदा करता है। हर साल खुराफ़ात में इज़ाफ़ा होता है। और अफ़सोस कि यह सब नबी ﷺ के नाम पर हो रहा है।और आगे आने वाली नस्लें क्या करेगी आप खुद सोचिए क्योंकि बिदॳ़त कभी बांझ नहीं होती हर साल नए नए ख़ुराफ़ात जनम देती है। और जो लोग इसके खिलाफ आवाज़ उठाते हैं उन्हें "गुस्ताख़" और "बुग़ज़-ए-अहले-बैत" का लेबल लगा दिया जाता है।
नबी ﷺ ने उम्मत को हर एक इबादत और अमल से मुतल्लिक तालीम दी?
आज मैने दीन को तुम्हारे लिए मुकम्मल कर दिया है और अपनी नेमतें तुम पर तमाम कर दी है और तुम्हारे लिए इस्लाम को तुम्हारे दीन की हैसियत से कबूल कर लिया है। सूरह अल मायदह:3
सोचने वाली बात यह है कि अगर यह इस्लाम में इतनी बड़ी अहमियत रखता, तो अल्लाह किसी नबी को कम से कम एक आयत के जरिए इस बात की जानकारी देते या नबी ﷺ इसे सहाबा को जरूर बताते ताकि कोई इस नेक अमल से वंचित न रहे।
न तो कोई आयत न ही कोई हदीस इस बात की पुष्टि करती है कि ईद-मिलाद मनाना वाजिब या सुन्नत है। जो भी काम बाद में पैदा हुआ और तीनों पीढ़ियों (सहाबा, ताबेईन और ताब-ताबेईन) में नहीं किया गया, वह कभी सुन्नत नहीं हो सकती; इसे सिर्फ बिदअत कहा जा सकता है।
👉 Allah ki na-farmani karne walon ka kya anjam hota hai padhen Yahanनबी ﷺ की असली मोहब्बत का सही तरीका
नबी ﷺ से सच्ची मोहब्बत का सबसे बड़ा सबूत आपकी सुन्नत का पालन है।
अल्लाह तआला फ़रमाते हैं:
इस आयत में मोहब्बत का दावा करने वालों को रसूल ﷺ की पैरवी करने का आदेश दिया गया है।
इसलिए नबी ﷺ से मोहब्बत का अर्थ है:
- आपकी सुन्नत को सीखना।
- नमाज़ की पाबंदी करना।
- सच्चाई और अमानतदारी अपनाना।
- अच्छे अख़लाक़ पैदा करना।
- आपकी बताई हुई इबादतों को उसी तरह करना।
- आपके आदेशों का पालन करना।
- आपकी सीरत से अपनी ज़िंदगी को सुधारना।
- लोगों के साथ रहम और इंसाफ़ करना।
असल मोहब्बत कैसे करें?
जरूर जश्न मनाएँ, लेकिन सुन्नत के मुताबिक़:
जलूस, झंडे, डीजे, नाच-गाने और सड़क जाम करने से नहीं।
बल्कि मजलिसें और जलसे करें।
नबी ﷺ की शान-ओ-अज़मत, फ़ज़ाइल, मोज़िज़ात और आपकी तालीमात का ज़िक्र करें।
और यह काम साल में सिर्फ़ एक दिन नहीं, बल्कि हर हफ़्ते, हर महीने और हर दिन होना चाहिए।
क्या नबी ﷺ की पैदाइश पर खुशी मनाना गलत है?
नबी ﷺ की पैदाइश पर खुशी मनाना अपने आप में कोई बुरी बात नहीं। बल्कि एक मुसलमान के लिए नबी ﷺ का दुनिया में आना बहुत बड़ी नेमत है।
लेकिन यहाँ खुशी और दीनी रस्म के बीच अंतर समझना ज़रूरी है।
यही वह ख़ास बात है जहाँ उलमा के बीच इख़्तलाफ़ पाया जाता है।
इसलिए इस विषय में एक-दूसरे की नीयत पर हमला करने के बजाय सहीह दीन को समझने की कोशिश करें कि हम नबी ﷺ के नाम पर नबी ﷺ की पैरवी कर रहे हैं या मुखालफत। असल खुशी नबी ﷺ की तालीमात पर अमल करने और कराने में या जश्न और ख़ुराफ़ात करने में होनी चाहिए।
नेमत का चर्चा/ज़िक्र
कुछ लोग नेमत का चर्चा से मुतल्लिक़ क़ुरआन की कुछ आयतों को लेकर ईद मिलाद की दलील पेश करते है जो कि सरासर कम इल्मी की निशानी है।
नेमत (अनुकंपा और रहमत) का ज़िक्र करना और उसका इज़हार करना, यह भी कुरआन का हुक्म है।
अल्लाह तआला फ़रमाता है:
📖 (सूरह अ-दुहा : 11)
गलत ताबीर
लेकिन अफ़सोस कि इस आयत को भी कुछ उलमा ने ईद मिलादुन्नबी से जोड़ कर लोगों को गुमराही के रास्ते पर डाल रखा है। जबकि हक़ीक़त यह है कि इस आयत का तअल्लुक़ किसी ख़ास दिन या जलूस-जंडियों से नहीं है।
नेमत का असल इज़हार
नेमतों का चर्चे करने का सही तरीक़ा यह है कि:
इंसान अपनी ज़ुबान से अल्लाह का शुक्र अदा करे।
यह इकरार करे कि जो भी नेमतें मुझे मिली हैं, यह सब अल्लाह का फ़ज़्ल और एहसान है, मेरा अपना कोई कमाल नहीं।
नेमत-ए-नुबूवत का इज़हार
नुबूवत (पैग़म्बरी) की नेमत का इज़हार इस तरह हो सकता है कि:
हम दावत व तब्लीग़ का हक़ अदा करें।
नबी ﷺ की सीरत और तालीमात को अपनी ज़िंदगी में अपनाएँ।
नेमत-ए-कुरआन का इज़हार
कुरआन की नेमत का इज़हार इस तरह हो सकता है कि:
लोगों में कुरआन की तालीम को फैलाया जाए।
उसकी हिदायत को लोगों के दिलों और ज़हन में बैठाया जाए।
नेमत-ए-हिदायत का इज़हार
हिदायत (सीधा रास्ता) की नेमत का इज़हार यह है कि:
अल्लाह की भटकी हुई मख़लूक़ को सही रास्ता दिखाया जाए।
लोगों को तौहीद और सुन्नत की ओर बुलाया जाए।
मिलाद-उन-नबी ﷺ से जुड़ी कुछ आम गलतफहमियाँ
1️⃣ क्या मिलाद-उन-नबी ﷺ सुन्नत है?
2️⃣ क्या यह "अच्छी बिदअत" (बिदअत-ए-हसना) है?
👉 "हर बिदअत गुमराही है और हर गुमराही जहन्नम की तरफ ले जाती है।" 📕 (सुनन-नसाई: 1578)
एक और हदीस में नबी ﷺ ने फरमाया:
👉 "जिसने ऐसा अमल किया जिस पर हमारा कोई अमल नहीं है, वह अमल مردूद है।" 📕 (सहीह बुखारी: 2697)
3️⃣ क्या यह रसूल ﷺ की ताज़ीम के लिए है?
क्या हम उनसे ज़्यादा नबी ﷺ की इज़्ज़त और मोहब्बत कर सकते हैं? बिल्कुल नहीं।
4️⃣ क्या इससे रसूल ﷺ को याद किया जाता है?
नबी ﷺ को याद करने के लिए किसी खास दिन की ज़रूरत नहीं है। असली मोहब्बत यह है कि रसूल ﷺ की सुन्नत और तालीमात को हर दिन की जिंदगी में अपनाया जाए।
5️⃣ क्या यह नबी ﷺ से मोहब्बत का इज़हार है?
📖 "अगर तुम अल्लाह से मोहब्बत करते हो, तो मेरी इताअत करो, अल्लाह तुमसे मोहब्बत करेगा।" (सूरह आल-इमरान: 31)
और एक और जगह फरमाया गया:
📖 "जिसने रसूल की इताअत की, उसने दरअसल अल्लाह की इताअत की।" (सूरह निसा: 80)
इसलिए असली मोहब्बत यह नहीं कि जुलूस निकाले जाएँ, डीजे बजे, या गाने-नाच हों। बल्कि असली मोहब्बत यह है कि हम नबी ﷺ की सुन्नतों और फरमानों पर अमल करें और अपनी जिंदगी को उसी रास्ते पर ढालें जो उन्होंने बताया।
नबी ﷺ की ज़िक्र साल में एक दिन नहीं, पूरी ज़िंदगी हो
नबी ﷺ की पैदाइश और सीरत को याद करना केवल रबीउल अव्वल तक सीमित नहीं होना चाहिए।
नबी ﷺ से सच्ची मोहब्बत यह नहीं कि साल में सिर्फ़ एक दिन जुलूस या जलसा करके दिखाया जाए, बल्कि असली मोहब्बत यह है कि हर दिन, हर महीने, हर घंटे और हर मिनट नबी ﷺ की सुन्नत और तालीमात को ज़िंदगी में उतारा जाए। अगर ईद मिलादुन्नबी मनानी है, तो फिर इसी अंदाज़ में मनानी चाहिए।
यही मोहब्बत को अमल में बदलने का रास्ता है।
आज का हाल
आज के दौर में पैदाइश के दिन:
जलूस और झंडे निकाले जाते हैं।
सड़कें जाम की जाती हैं।
गाने-बजाने और नाच-गाने तक होते हैं
और उसी दिन पाँच वक्त की नमाज़ तक क़ुर्बान कर दी जाती है। ये कैसी मुहब्बत है ?
🔊आख़िर में एक गुज़ारिश आप लोगों से
📌 Conclusion:
Jashn-e-Eid Milad-un-Nabi ﷺ Ki Haqeeqat को समझने के लिए भावनाओं के साथ-साथ क़ुरआन, सहीह हदीस और इस्लामी इतिहास को भी देखना चाहिए।नबी ﷺ से मोहब्बत हमारे ईमान का हिस्सा है, लेकिन मोहब्बत का सबसे खूबसूरत और प्रमाणित रास्ता आपकी इत्तिबा (पैरवी), सुन्नत पर अमल और आपकी शिक्षाओं को अपनी ज़िंदगी में लागू करना है।
आज अगर हम सच में नबी ﷺ से मोहब्बत का दावा करते हैं तो हमें उन्हीं के तरीक़े पर चलना होगा—न कि अपनी तरफ़ से नए तौर-तरीक़े और बिदअत ईजाद करनी होंगी। असली मोहब्बत यह है कि हम उनकी सुन्नतों को ज़िन्दगी के हर पहलू में अपनाएँ, उनकी तालीमात को अमल में लाएँ और उनके अख़लाक़ को अपनी पहचान बनाएँ।
इसलिए हमें चाहिए कि हम मिलाद-उन-नबी ﷺ को बिदअत और खुराफ़ात से अलग रखकर, नबी ﷺ के बताए हुए तरीके यानी सोमवार के रोज़े और उनकी सुन्नतों को ज़िन्दगी में अपनाकर ही अपने ईमान और मोहब्बत को साबित करें। यही असली मोहब्बत है, यही असली इबादत है, और यही हमें अल्लाह और उसके रसूल ﷺ के क़रीब ले जाएगी।
🤲 अल्लाह तआला हमें अपने प्यारे नबी मुहम्मद ﷺ की सच्ची मोहब्बत, आपकी सुन्नत की पैरवी और दीन की सही समझ अता फ़रमाए।
आमीन।
🤲अल्लाह हमें हक़ीक़ी मोहब्बत और सही दीन की समझ अता करे। आमीन या रब्ब-ल-आलमीन।
FAQs – Jashn-e-Eid Milad-un-Nabi ﷺ Ki Haqeeqat
1. ईद मिलादुन्नबी ﷺ क्या है?
ईद मिलादुन्नबी ﷺ से आम तौर पर रबीउल अव्वल में नबी ﷺ की पैदाइश की याद में आयोजित होने वाले कार्यक्रम से मुराद है, जिसमें सीरत, नात और तक़रीर आदि होती हैं।
2. क्या ईद मिलादुन्नबी ﷺ क़ुरआन से साबित है?
क़ुरआन में नबी ﷺ की पैदाइश की खुशी में किसी वार्षिक ईद या समारोह का स्पष्ट आदेश नहीं मिलता। हालांकि नबी ﷺ की सीरत और आपकी शिक्षाओं का पालन क़ुरआन की स्पष्ट हिदायतों में शामिल है।
3. क्या ईद मिलादुन्नबी ﷺ सहीह हदीस से साबित है?
नबी ﷺ से रबीउल अव्वल में वार्षिक मिलाद समारोह मनाने की कोई स्पष्ट सहीह हदीस साबित नहीं है। सहीह मुस्लिम में सोमवार के रोज़े का उल्लेख मिलता है, जिसमें नबी ﷺ ने अपनी पैदाइश का ज़िक्र किया। (सहीह मुस्लिम: 1162)
4. ईद मिलादुन्नबी ﷺ की शुरुआत कब हुई?
नबी ﷺ, सहाबा और ख़ुलफ़ाए राशिदीन के दौर में वार्षिक मिलाद समारोह का प्रमाण नहीं मिलता। इतिहास की किताबों में बाद की सदियों में इरबिल के शासक मलिक मुज़फ़्फ़र के दौर में बड़े मिलाद समारोहों का उल्लेख मिलता है।
5. क्या ईद मिलाद मनाना सुन्नत है?
नबी ﷺ से ईद मिलाद को एक वार्षिक धार्मिक उत्सव के रूप में मनाने की स्पष्ट सुन्नत साबित नहीं है। इसी कारण कई विद्वान इसे धार्मिक रूप से निर्धारित समारोह मानने से सहमत नहीं हैं, जबकि कुछ विद्वानों ने शरई सीमाओं के भीतर सीरत और खुशी के ऐसे आयोजन को जायज़ माना है।
6. नबी ﷺ से सच्ची मोहब्बत कैसे साबित होती है?
नबी ﷺ से सच्ची मोहब्बत आपकी सुन्नत की पैरवी, आपके आदेशों का पालन, अच्छे अख़लाक़ और आपकी सीरत को अपनी ज़िंदगी में अपनाने से साबित होती है। (सूरह आले-इमरान 3:31)
7. क्या नबी ﷺ की पैदाइश पर खुशी मनाना गलत है?
नबी ﷺ की पैदाइश पर खुशी होना गलत नहीं है। विवाद इस बात पर है कि क्या इस खुशी को हर साल एक निर्धारित धार्मिक त्योहार या इबादत के रूप में मनाना शरीअत से साबित है।
8. क्या नबी ﷺ ने अपनी पैदाइश का दिन याद किया था?
हाँ। सहीह मुस्लिम में है कि सोमवार के रोज़े के बारे में पूछे जाने पर नबी ﷺ ने फ़रमाया कि यह वह दिन है जिस दिन मैं पैदा हुआ। (सहीह मुस्लिम: 1162)
9. क्या मिलाद के कार्यक्रम में सीरत पढ़ना जायज़ है?
नबी ﷺ की सीरत पढ़ना, आपकी शिक्षाओं को समझना और उनसे सबक लेना नेक काम है। लेकिन किसी विशेष वार्षिक धार्मिक रस्म को सही ठहराने के लिए अलग से शरई दलील की आवश्यकता होती है।
10. क्या मिलाद मनाने वाले को मुशरिक या काफ़िर कहना सही है?
नहीं। किसी व्यक्ति पर शिर्क या कुफ़्र का हुक्म लगाना अत्यंत गंभीर मामला है। केवल मिलाद मनाने के कारण किसी मुसलमान को मुशरिक या काफ़िर कहना सही नहीं है।
11. मिलाद के नाम पर किन बातों से बचना चाहिए?
ग़ुलू और अतिशयोक्ति, झूठी या बेबुनियाद रिवायतें, हराम मनोरंजन और ऐसे अकीदे या अमल जिनकी शरीअत में कोई दलील नहीं, उनसे बचना चाहिए।
12. नबी ﷺ की मोहब्बत का सबसे अच्छा तरीका क्या है?
नबी ﷺ की मोहब्बत का सबसे अच्छा तरीका आपकी सुन्नत सीखना, आपकी पैरवी करना, दरूद पढ़ना, आपकी सीरत को समझना और आपके बताए हुए तरीके के अनुसार अपनी ज़िंदगी सुधारना है।

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